उद्धरण - 923

शुबहा था कि इसमें सचाई बिल्कुल नहीं है, यह दूसरे कॉलेजों के लड़कों की शरारत भर है लेकिन यह वह समय था जब सत्य और अफ़वाह, किस्से और हक़ीक़त, जनसेवक और दमनकर्ता, शरीर और उसकी परछाई का भेद मिट गया था। आंतक अंतश्चेतना में इस क़दर प्रवेश कर गया था कि युवा एक हाथ से साइकिल चलाने का अभ्यास करने लगे थे। भतीजा चूंकि कैंची चलाता था इसलिए एक हाथ से साइकिल दौड़ाने के रियाज़ में बार बार गिर जाता था। चाचा और भतीजा जल्द ही इतना भयभीत हो गये कि वे सोते समय, खाते समय,नहाते समय-हर समय अपना एक हाथ लिंग की रक्षा में तैनात किये रहते।

Comments

Popular posts from this blog

उद्धरण - 797

उद्धरण - 549