उद्धरण - 672

चिचिड़ापन वाजिब था, क्योंकि इंटर क्लास ही सही, रात को सोते सब हैं, और तड़के तीन बजे दरवाजा खोल कर खड़े हो जाना दूसरे मुसाफिरों को न सुहाये तो अचम्भा नहीं होना चाहिए। रेल का सपफर शायद इस तरह के आत्म-प्रकाशन को सहज बनाता है- चलती गाड़ी में हम अजनबी को भी बहुत सी ऐसी निजी बातें कह देते हैं जो अपने ठिकाने पर घनिष्ठ मित्रों से भी न कहें। समाज में आदमी अपने सब छद्य, कवच, अस्त्र-शस्त्र जो धारण किये रहता है और सब ओर से चौकस रहता है, रेल में वह इन्हें उतार कर सहज स्वाभाविक मानव प्राणी हो जाता है।

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