उद्धरण - 865
जब हम एक बार ‘रूप‘ को स्वीकार कर लेते हैं, तो हम कुछ भी फेंक नहीं सकते। न जाने सत्य किस ‘रूप‘ में छुपा हो। हर एक रूप का एक नाम है और एक गुण भी। बस तब हम रूप की इतनी भीड़ में उलझे रह जाते हैं। लेकिन अफसोस हर रूप की आत्मा हमसे ओझल रहती है।
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