उद्धरण - 975
रामायण धारावाहिक प्रसारण के वक़्त सारे मनुष्य मूक हो जाते थे, सभी का व्यक्तित्व सिमट कर उनकी आंखों में क़ैद हो जाता था।
क्यों देखूं इस मुंहझौसे को। आदमी अभी यहां है, अगले पल वहां है। अभी कोई बोल रहा है अगले मिनट में कोई और दिख रहा है। और ये बीच बीच में न जाने कौन बौरा कर मंजन, क्रीम, पाउडर, बिस्कुट, की फिलिम चलाने लगता है।
समस्या यह थी कि दादी आख्यान की दूसरी संरचना की अभ्यस्त थीं जिसमें कहानी एक के बाद एक-इसके बाद यह-करके आगे बढ़ती है। इसी ढंग के अनगिनत क़िस्से, गाथाएं उनको याद भी थीं जिन्हें वह अपने छोटे भाई बहनों से लेकर सूर्यकांत नुपूर तक-तीन पीढ़ियों के बीच-सुनाती आ रही थीं।
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