उद्धरण - 692
कामकाज ही तो संसार की व्यवस्था को स्थिर, एकरूप रखने वाली एकमात्र वस्तु है- और मौसी विद्यावती तथा शशि दिन भर किसी न किसी काम में जुटी रहती थीं......कभी जब पास-पड़ोस की औरतें हमदर्दी दिखाने आ बैठतीं, तब भी वे कुछ न कुछ काम लिए बैठी रहतीं और निष्ठा पूर्वक उस छिछली, कभी-कभी मिथ्या, और प्रायः ही रूढ़िगत संवेदना के लिए आँचल पसारे रहतीं।
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