उद्धरण - 835
रोगी की सुश्रूषा एक विज्ञान है, बुद्धि पर आश्रित है, उसमें भावना के लिए स्थान नहीं है। पाश्चात्य सभ्यता से आक्रान्त लोग उस भारतीय माँ पर हँसते हैं, जो रोगी बच्चे को डॉक्टर के पास नहीं ले जाती, छाती से चिपटा कर रात भर सुन्न बैठी रहती है......निरा प्रवृत्तिजन्य प्रेम- पशु-माता की आहट शिशु के लिए निर्बुद्धि व्याकुलता- ये वैज्ञानिक सुश्रूषा नहीं है, पर अनिवार्य तो है- कम से कम विज्ञान सी अनिवार्य- धमनी के स्पन्दन सी अनिवार्य.....और जहाँ विज्ञान अपनी लाचारी जानता है, वहाँ इस मूलवृत्ति की शक्ति ही एक शक्ति है, जो लाचार नहीं है- मृत्यु के आगे भी नहीं, क्योंकि मृत्यु सबसे पहले मृत्यु-भय है, और प्यार के वातावरण से घिरे हुए प्राण को वह भय छू नहीं पाता।
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