उद्धरण - 988
सबसे दिलचस्प बात यह थी कि दादी ने जिंदगी में बुरे की तुलना में अच्छाई काफ़ी की थी किंतु उन्हें स्वर्ग के सपने कभी नहीं आते थे जबकि नर्क को प्रायः देखती थीं और और डर कर उठ जाती थीं। आंख खुलने के बाद भी कुछ देर वह थर थर कांपती रहती थीं।
उन्हें न जीवन भयभीत कर पाता था न मृत्यु का उन्हें ख़ौफ़ था। वह जीवन को खींचे जाने की प्रार्थना नहीं करती थीं और मौत को पुकारती भी नहीं थीं। हर सुबह का जागना उनके लिए जीवन का आगमन था और आंखों में नींद भरने के क्षण वह जीवन मृत्यु के अनिश्चय में आत्मसमाधि ले लेती थीं।
“इस उमिर में जी कर क्या कर लूंगी और मर कर भी।“ शायद उनकी मौजूदगी की यह सर्वाधिक अचूक व्याख्या थी।
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