उद्धरण - 652
रोज सुनने में आता है कि नेता नहीं है, नेता नहीं है......ऐसे नेताओं के बोझ से समाज कुचला ही जाएगा, उठेगा कैसे.....जो ऊपर से लादा जाएगा, वह भार ही होगा, भारवाहक कैसे होगा? भार उठाने की सामर्थ्य तो उसमें होगी, जो नीचे से उठेगा- बिघ्नों, बन्धनों, भारों, श्रृंखलाओं की उपेक्षा करता हुआ, चोटों से दृढ़ हुए पुट्ठे और संघर्ष से दृढ़ हुआ हृदय लेकर अभिमान भरा और मुक्त.......
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