उद्धरण - 688
हाँ, मैं तो आता हूँ कि थोड़ी देर के लिए जीवन के भरपूर प्रवाह में अपने ढाल सकूँ- मुझे तो हमेशा यह डर रहता है कि कहीं तटस्थता के नाम पर मैं उस से बिल्कुल दूर ही न जा पड़ूँ। यहाँ बैठकर अपने को मानवता का अंग मान सकता हूँ- उस के समूचे जीवन का स्पन्दन अनुभव कर सकता हूँ।
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