उद्धरण - 684
जो पुरूष और स्त्री उसे घेरे हुए हैं और उसकी दुनिया को बनाते हैं, वे सब अन्ततोगत्वा बुरे नहीं हैं, वे सदिच्छाओं के बलहीन पुञ्ज हैं- उनमें सत्कामना है, लेकिन कामना पर्याप्त नहीं है, वे इससे सन्तुष्ट हैं कि वे शिव की कामना करने जाएँ और अशिव उन्हें घेर लें, बाँध लें, तोड़ लें......क्या ऐसों से घृणा करने का साहस मानव कर सकता है?
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